श्रीहरिकोटा (31 दिसंबर 24)। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक और ऐतिहासिक कदम बढ़ाया है और अंतरिक्ष तकनीकी के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की है। श्रीहरिकोटा से PSLV-C60 रॉकेट द्वारा दो छोटे स्पेसक्राफ्ट लॉन्च किए गए, जो इसरो के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुए हैं। यह पहली बार है जब इसरो ने पृथ्वी से 470 किलोमीटर की ऊंचाई पर दो स्पेसक्राफ्ट के बीच डॉकिंग और अनडॉकिंग का प्रयोग किया। इन दोनों स्पेसक्राफ्ट को बहुत तेज गति से अंतरिक्ष में जोड़ने और फिर अलग करने का काम किया गया।
इस सफल प्रयोग के बाद भारत अब अमेरिका, रूस और चीन के साथ स्पेस डॉकिंग और अनडॉकिंग की तकनीक में शामिल हो गया है। इसरो का यह मिशन 'स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट' (SpaDex) के नाम से जाना जाता है और इस सफलता ने भारत को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष समुदाय में एक प्रमुख स्थान दिलाया है। इसके साथ ही इसरो ने इस डॉकिंग सिस्टम का पेटेंट भी हासिल किया है, क्योंकि आमतौर पर दुनिया के प्रमुख अंतरिक्ष संस्थान इस तकनीक के बारें में अधिक जानकारी साझा नहीं करते। ऐसे में इसरो को अपनी खुद की डॉकिंग प्रणाली विकसित करनी पड़ी।
SpaDex मिशन में दो स्पेसक्राफ्ट शामिल थे, जिनका नाम 'टारगेट' (लक्ष्य) और 'चेजर' (पीछा करने वाला) रखा गया। इन दोनों का वजन 220 किलोग्राम है। PSLV-C60 रॉकेट ने इन दोनों स्पेसक्राफ्ट को 470 किलोमीटर की ऊंचाई पर अंतरिक्ष में भेजा। इसके बाद इन दोनों स्पेसक्राफ्ट ने अलग-अलग दिशाओं में उड़ान भरी, और फिर एक-दूसरे के साथ डॉकिंग और अनडॉकिंग की प्रक्रिया पूरी की। यह मिशन केवल एक तकनीकी सफलता ही नहीं है, बल्कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की महत्वाकांक्षाओं के लिए एक बड़ा कदम भी है। इस तकनीक का उपयोग भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना और चंद्रयान-4 जैसे मिशनों के लिए भी किया जाएगा। इसरो का लक्ष्य अब एक स्वदेशी अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने का है, और इसके लिए डॉकिंग-अनडॉकिंग तकनीक बेहद महत्वपूर्ण है।
SpaDex मिशन की सफलता भारतीय चंद्र मिशन चंद्रयान-4 के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। चंद्रयान-4 मिशन में डॉकिंग और अनडॉकिंग की इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इसरो के मुताबिक, चंद्रयान-4 की सफलता SpaDex के परिणामों पर निर्भर करेगी, क्योंकि यह मिशन एक बहु-चरणीय प्रक्रिया के तहत लॉन्च किया जाएगा। इस तकनीक की मदद से इसरो अंतरिक्ष में अधिक जटिल ऑपरेशंस, जैसे कि स्पेस स्टेशन के निर्माण, सैटेलाइट सर्विसिंग, इंटरप्लेनेटरी मिशन, और मानव मिशन के लिए तैयार होगा। इसके अलावा, जब अंतरिक्ष मिशन के विभिन्न चरणों में एक साथ कई उपग्रहों या स्पेसक्राफ्ट को लॉन्च करना होता है, तो इस डॉकिंग तकनीक की अहम भूमिका होती है। उदाहरण के लिए, यदि भविष्य में इंसान को चंद्रमा पर भेजने के लिए मिशन की योजना बनाई जाती है, तो इस तकनीक से बड़े अंतरिक्ष यान को डॉक और अनडॉक करना संभव होगा।