Monday, 28 Sep 2026

अमेरिका के लिए ईरान को मिटाना बेहद मुश्किल

नईदिल्ली (24 अगस्त 26)। भारतीय सैन्य विशेषज्ञ ने कहा कि ईरान ने अमेरिका के साथ संभावित युद्ध के लिए चार दशक तक तैयारी की थी, जिसमें उसके शीर्ष नेतृत्व के खत्म होने जैसी परिस्थितियों से निपटने की तैयारी भी शामिल थी, यही वजह है कि उसके विरोधियों के लिए ईरान को पूरी तरह तबाह करना मुश्किल हो रहा है। 'ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) अमेरिका' की ओर से शुक्रवार को वाशिंगटन में आयोजित एक परिचर्चा में भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल के.जे.एस. ढिल्लों ने कहा कि अमेरिका और इजराइल के साथ संघर्ष में भारी नुकसान उठाने के बावजूद ईरान में लंबा खींचने वाला युद्ध लड़ने की क्षमता है। भारत की रक्षा खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख ढिल्लों ने कहा कि इस युद्ध से सबसे बड़ी सीख यह है कि किसी भी सैन्य अभियान का राष्ट्रीय लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए और उससे बाहर निकलने की रणनीति पहले से तय होनी चाहिए।

ढिल्लों ने कहा, 'युद्ध शुरू करने से पहले कुछ बातें जानना जरूरी है। आपका घोषित राष्ट्रीय लक्ष्य आपके लिए, आपकी सेना और सरकार में मौजूद लोगों के लिए स्पष्ट होना चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि युद्ध के किस चरण में आप जीत की घोषणा कर सकते हैं।' उन्होंने कहा, 'इसके बाद निकास रणनीति आती है, खासकर तब जब युद्ध किसी दूसरे देश में लड़ा जा रहा हो। उस क्षेत्र से मैं कैसे बाहर निकलूंगा?' ढिल्लों ने कहा कि युद्ध में उतरने वाले देशों को युद्ध के विस्तार की स्थिति के लिए भी तैयारी करनी चाहिए और उस पर नियंत्रण रखना चाहिए, खासकर जब उनका सामना एक साथ अमेरिका और इजराइल जैसी शक्तियों से हो। ढिल्लों ने कहा कि ईरान ने पिछले 40 वर्षों में संभावित युद्ध की जिस रूपरेखा को ध्यान में रखकर तैयारी की थी, मौजूदा संघर्ष काफी हद तक उसी के अनुरूप रहा। उसने अपने शीर्ष नेतृत्व के संभावित नुकसान जैसी परिस्थितियों से निपटने की तैयारी भी पहले से कर रखी थी।

ढिल्लों ने बताया कि ईरान ने 'मोजेक सिद्धांत' अपनाया और अपनी सशस्त्र सेनाओं को 31 स्वतंत्र मुख्यालयों में विकेंद्रीकृत किया। केंद्रीय नेतृत्व नष्ट होने की स्थिति में भी ये मुख्यालय काम करने में सक्षम हैं। उन्होंने कहा कि ईरान ने लंबा खींचने वाला युद्ध लड़ने की क्षमता बरकरार रखी है, जिसमें कमजोर पक्ष को फायदा मिल सकता है। सेवानिवृत्त अधिकारी ने कहा कि ईरान का पहाड़ी भूभाग उसके विरोधियों के लिए जमीनी हमला मुश्किल बनाता है, जबकि इराक और सऊदी अरब के अपेक्षाकृत खुले रेगिस्तानी इलाकों में ऐसा करना आसान है। उन्होंने कहा, 'ईरान चारों ओर से पहाड़ों से घिरा एक कटोरे जैसा है और इसके भीतर रेगिस्तान है, जहां गर्मियों में तापमान 55 से 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है।' ढिल्लों ने कहा, 'ईरान के मध्य तक पहुंचने के लिए आपको उन पहाड़ों को पार करना होगा। आपको सचमुच हर चौकी पर कब्जा करना होगा, इसलिए जमीनी सैनिकों की तैनाती संभव नहीं थी।' उन्होंने कहा कि ईरान के पास विमानवाहक पोत या इतनी मजबूत वायुसेना नहीं है कि वह खुले समुद्र में सीधे अमेरिका को चुनौती दे सके।

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