उदयपुर (14 मार्च 25)। राजस्थान की समृद्ध परंपराओं में मेलों का विशेष स्थान है, और उदयपुर का ऐतिहासिक मटका मेला उन्हीं में से एक है। हर साल आंवला एकादशी के अवसर पर आयोजित होने वाला यह मेला मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं का प्रतीक है। 300 साल से भी अधिक पुरानी इस परंपरा की शुरुआत महाराणा संग्राम सिंह के शासनकाल में हुई थी और तब से लेकर आज तक यह मेला अपनी भव्यता बनाए हुए है।
इस मेले का महत्व सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मेवाड़ी संस्कृति को जीवंत बनाए रखने का भी एक जरिया है। ऐसा माना जाता है कि आंवला एकादशी से गर्मी की शुरुआत होती है, और इसी दिन से मिट्टी के बर्तनों का उपयोग किया जाता है। यह मेला विशेष रूप से उन कुम्हारों के लिए महत्वपूर्ण होता है, जो सालभर मिट्टी के बर्तन तैयार कर इस मेले में बेचते हैं। इस मेले में मटकियां, हंडिया, मिट्टी के तवे, बोतलें और दही जमाने के बर्तन जैसी पारंपरिक चीजें बेची जाती हैं। इनका उपयोग गर्मियों में अधिक किया जाता है क्योंकि ये स्वस्थ, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल होते हैं। मटकों को तैयार करने वाले कुम्हार महेंद्र जी बताते हैं कि ये मटकियां सर्दियों में बनाई जाती हैं और इस मेले के लिए विशेष रूप से सहेजकर रखी जाती हैं। सालभर की मेहनत के बाद कुम्हार इस मेले में अपने उत्पाद बेचते हैं।इस मेले की लोकप्रियता इतनी अधिक है कि हर साल उदयपुर संभाग के विभिन्न गांवों और शहरों से हजारों लोग इसमें भाग लेने आते हैं।