नईदिल्ली (09 अक्टूबर 26)। सरकारी सूत्रों ने गुरुवार को बताया कि सरकार ने सभी नॉन-शेड्यूल्ड एंटी-कैंसर दवाओं (ब्रांडेड और जेनेरिक, घरेलू और आयातित, पेटेंट वाली और बिना पेटेंट वाली दवाएं) के लिए ट्रेड मार्जिन को MRP के 30% तक सीमित करने का फैसला किया है। सूत्रों ने कहा कि इस कदम का मकसद बहुत ज़्यादा ट्रेड मार्क-अप की समस्या को दूर करना और इन जीवन रक्षक दवाओं की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए उन्हें सस्ता बनाना है। इस महीने के आखिर में लागू होने वाले इस फैसले से 110 एंटी-कैंसर दवाओं की कीमतें कम हो जाएंगी, जिनमें 35 पेटेंट वाली दवाएं भी शामिल हैं।
आप को बता दें कि एक याचिकाकर्ता ने आरोप लगाए थे कि निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों और उनके तीमारदारों को मनमानी कीमतों पर दवाएं खरीदने के लिए मजबूर किया जा जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कैंसर की जरूरी दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे दिन-दहाड़े डकैती बताया है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जो कैंसर की दवा रिटेलर को 2,700 रुपये में मिलती है, उसकी अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) 27,000 रुपये तक छापी जा रही है। कोर्ट ने कहा कि ' जब मरीज आयुष (AYUSH) योजना के तहत इलाज करा रहे हैं, तो इस पूरी कीमत का भुगतान करदाताओं को करना पड़ता है. अस्पताल इन कीमतों पर दवाएं खरीद रहे हैं और फिर सरकार से उसका पुनर्भुगतान यानी रीइम्बर्समेंट भी ले रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में दायर हैं दो याचिकाएं- याचिकाकर्ता नंबर 1 की मां और याचिकाकर्ता नंबर 3 की पत्नी को जुलाई में ब्रेस्ट कैंसर का पता चला था। इलाज और कीमोथेरेपी के दौरान इस परिवार ने निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों और उनके तीमारदारों के शोषण को बेहद करीब से देखा। उन्होंने अनुभव किया कि अस्पताल कैसे मरीजों को जबरन अपनी ही फार्मेसी से महंगी दवाएं खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। वे दवाएं अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी को मनमाने तरीके से बढ़ाकर बेचते हैं। जेनेरिक दवाओं की मांग करने वाले याचिकाकर्ता को दुत्कारा जाता है। फिलहाल सरकार ने अब दावाईयों के रेट को 30 प्रतिशत करने का फैसला लिया है।