नईदिल्ली (23 अगस्त 26)। सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हो रहे जस्टिस संजय करोल ने विदाई संबोधन में कहा कि न्यायाधीश भगवान नहीं हैं और हर फैसला सही होना संभव नहीं है। उन्होंने न्याय में विनम्रता, संवेदनशीलता और आम नागरिक की बात का जिक्र किया। उन्होंने करीब चार दशक के अपने कानूनी सफर को याद करते हुए कहा कि जज बनने के लिए कुछ हद तक विनम्रता और हर केस करने वाले के पीछे के असली इंसान को देखने की काबिलियत होनी चाहिए।
संविधान हमसे सिर्फ़ कानून को सही तरीके से लागू करने के लिए नहीं कहता। यह हमसे इसे सही तरीके से लागू करने के लिए कहता है। शायद इसीलिए मुझे हमेशा यह तय करने की ज़िम्मेदारी ज़्यादा बड़ी लगी है कि कौन कानूनी तौर पर सही है। उन्होंने कहा कि हम, जज के तौर पर, भगवान नहीं हैं। हम हर फ़ैसला सही नहीं कर पाएँगे। हमारे हाथ में हमेशा आसान था: सिर्फ़ पिटीशनर को नहीं, बल्कि इंसान को देखना। एक पिटीशन आपको सिर्फ़ केस के फैक्ट्स बता सकती है, लेकिन यह आपको यह नहीं बता सकती कि इंसान पहले ही क्या खो चुका है या वह कोर्ट से क्या पाने की उम्मीद कर रहा है। जस्टिस करोल ने कहा, 'और शायद इसीलिए मैंने हमेशा कहा है कि जज करने के लिए एक खास लेवल की विनम्रता की ज़रूरत होती है।' आप को बता दें कि जस्टिस करोल को 6 फरवरी 2023 को सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया गया था। उनके ऑफिस के आखिरी दिन एक सेरेमोनियल बेंच में CJI कांत और जस्टिस करोल, जॉयमाल्या बागची और वी मोहना शामिल थे।
जस्टिस करोल ने लीगल प्रोफेशन में अपने लगभग चार दशक के सफर पर बात की और कहा कि कोर्टरूम उनके लिए कभी भी सिर्फ एक वर्कप्लेस नहीं रहा, बल्कि खुद से 'बड़ी और ज़्यादा जरूरी' किसी चीज के लिए एक जरिया रहा। मैं यह दिखावा नहीं करूंगा कि यह सफर सिर्फ मेरा रहा है। इस कोर्टरूम ने मुझे नहीं छोड़ा है उन्होंने कहा, इसने मुझे सपोर्ट किया है। जस्टिस करोल ने कहा कि उन्होंने 40 साल कोर्टरूम में बिताए, शुरुआत में एक वकील के तौर पर बेंच के सामने पेश हुए और पिछले 19 सालों से एक जज के तौर पर काम किया। उन्होंने कही गई दलीलों के अलावा सुनने की अहमियत के बारे में बात की और कहा कि कोर्टरूम में 'वाक्पटु खामोशी' होती है जिसे जजों को समझना सीखना चाहिए।