Monday, 28 Sep 2026

दुनिया के सामने भारतीय दृष्टिकोण: अमित शाह

मुंबई (14 सितंबर 26)। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को कहा कि देश के इतिहास और ज्ञान को उपनिवेशवादी प्रभाव से मुक्त करने का मतलब अतीत को मिटाना नहीं, बल्कि 'भारतीय दृष्टिकोण से ऐतिहासिक सच्चाई को प्रामाणिक तरीके से दुनिया के सामने प्रस्तुत करना है।' उन्होंने एशियाटिक सोसायटी मुंबई में एक पांडुलिपि प्रदर्शनी का उद्घाटन करने के बाद कहा कि भारतीय ज्ञान, इतिहास, परंपराओं, भाषाओं, पांडुलिपियों और अभिलेखों को संरक्षित किया जाना चाहिए तथा इन्हें देश और दुनिया भर के लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए। शाह ने कहा कि लंबे समय तक भारतीय ज्ञान की व्याख्या औपनिवेशिक दृष्टिकोण से की जाती रही, जिसने हीनभावना पैदा करने में योगदान दिया।

शाह ने विश्वास जताया कि एशियाटिक सोसायटी जैसी संस्थाएं भारतीय ज्ञान और विरासत को संरक्षित करने तथा देश और दुनिया के कल्याण के लिए उसका उपयोग करने में मदद करेंगी। वर्ष 1804 में स्थापित एशियाटिक सोसायटी मुंबई शहर की सबसे पुरानी गैर-सरकारी संस्थाओं में से एक है। इसका उद्देश्य सामान्य रूप से एशिया और विशेष रूप से भारत के संदर्भ में भाषा, दर्शन, कला तथा प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञानों के अध्ययन और शोध को प्रोत्साहित करना है। शाह ने कहा, 'उपनिवेशवाद से मुक्ति का मतलब इतिहास को मिटाना नहीं है। हमारी नजर से इसका अर्थ है कि ऐतिहासिक सच्चाई को प्रामाणिक तरीके से और भारतीय दृष्टिकोण से दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जाए।' उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने ज्ञान और सत्ता को एक-दूसरे के साथ जोड़ दिया था तथा अब जरूरत इस बात की है कि ज्ञान को उस ढांचे से मुक्त किया जाए। शाह ने कहा, 'आज हम ज्ञान को उस ढांचे से मुक्त करने और उसे उपनिवेशवादी प्रभाव से मुक्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।'

इंडोलॉजी' यानी भारतविद्या के विषय का उल्लेख करते हुए शाह ने कहा कि इसमें इतिहास, पुरातत्व, भाषा विज्ञान, दर्शन, साहित्य, धर्म, व्याकरण, मानव विज्ञान, अभिलेख विज्ञान और मुद्राशास्त्र जैसे विभिन्न विषय शामिल हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि लंबे समय तक भारतीय ज्ञान की व्याख्या औपनिवेशिक दृष्टिकोण से की जाती रही। शाह ने कहा, 'भारतीय ज्ञान को भारत की अपनी आवाज में नहीं लिखा जा रहा था। इसे औपनिवेशिक दृष्टिकोण से लिखा जा रहा था।' शाह ने एशियाटिक सोसायटी में संरक्षित संग्रह का भी उल्लेख किया, जिसमें चित्रों से सुसज्जित महाभारत की प्रतियां, जैन कल्पसूत्र और बौद्ध ग्रंथ शामिल हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी सामग्री को देशभर के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए। 

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