नईदिल्ली (17 सितंबर 25)। नेपाल इन दिनों बड़े राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री केपी ओली को अचानक पद से इस्तीफा देना पड़ा और सेना के समर्थन से सुशीला कार्की की अंतरिम सरकार बनी। इस तेज घटनाक्रम ने शक पैदा किया है कि कहीं इसके पीछे अमेरिका की गुप्त भूमिका तो नहीं। नेपाल में अतीत में भी अमेरिका पर हस्तक्षेप के आरोप लगते रहे हैं। नेपाल के इतिहास और ताज़ा घटनाओं को देखकर कई राजनीतिक गलियारों में चर्चा हैं कि सत्ता परिवर्तन की GenZ स्क्रिप्ट वॉशिंगटन ने ही लिखी।
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली को ज़बरदस्त विरोध प्रदर्शनों के बीच केवल दो दिन में पद छोड़ना पड़ा। यह प्रदर्शन सरकार द्वारा लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाने के बाद भड़के और देखते-ही-देखते हिंसक हो गए। इस बवाल में 70 लोगों की मौत हो गई और हजारों लोग घायल हुए हैं। यह आंदोलन मुख्य रूप से नेपाल के Gen Z (18 से 28 वर्ष) युवाओं ने चलाया। उनका आरोप था कि ओली सरकार ने 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का गला घोंट दिया है और सेना का इस्तेमाल नागरिकों के खिलाफ किया जा रहा है। गुस्सा काठमांडू से फैलकर बड़े शहरों तक पहुंचा और हालात बेकाबू हो गए।
भारतीय सेना के सेवानिवृत्त अधिकारी मेजर जनरल जीडी बख्शी का मानना है कि ओली सरकार का अचानक गिरना केवल आंतरिक विरोध का नतीजा नहीं हो सकता। उनका तर्क है कि नेपाल में पहले भी CIA की छाप दिख चुकी है। एक्सपर्टस का मानना है कि शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने नेपाल को चीन के खिलाफ अपने गुप्त अभियानों का हिस्सा बनाया। खुफिया जानकारी इकट्ठा करना, दुष्प्रचार फैलाना और अर्धसैनिक गतिविधियां चलाना-ये सब अमेरिका की रणनीति का हिस्सा थे। 1971 में निक्सन सरकार के गुप्त दस्तावेजों से इस बात का खुलासा हुआ था। 1960 के दशक में अमेरिका ने नेपाल में बसे तिब्बती शरणार्थियों को हथियार और ट्रेनिंग दी। इससे मस्टैंग गुरिल्ला बल बना, जो चीन विरोधी गतिविधियों में लगा रहा। लेकिन जब अमेरिका और चीन के रिश्ते सुधरे, तो अमेरिका ने इस बल का साथ छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि नेपाल को कूटनीतिक परेशानियां झेलनी पड़ीं।