दुर्ग (06 जुलाई 26)। छत्तीसगढ़ की मिट्टी की महक, लोकसंस्कृति की आत्मा और पंडवानी की सबसे बुलंद आवाज़ अब हमेशा के लिए खामोश हो गई। अपनी सशक्त वाणी, जीवंत अभिनय और अद्वितीय प्रस्तुति शैली से महाभारत की गाथाओं को गांव की चौपाल से लेकर दुनिया के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंचों तक पहुंचाने वाली पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन हो गया। उनके निधन के साथ भारतीय लोककला का एक ऐसा स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया, जिसने छत्तीसगढ़ की पहचान को वैश्विक मंच पर नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी मृत्यु की खबर मिलते ही पूरे प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गई। साहित्य, कला, संगीत, संस्कृति और राजनीति जगत से जुड़े लोगों ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए इसे देश की अपूरणीय क्षति बताया। वर्षों तक अपनी दमदार आवाज़ से महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देने वाली तीजन बाई अब स्वयं इतिहास का अमर अध्याय बन गई हैं।
तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को तत्कालीन दुर्ग जिले (वर्तमान बालोद क्षेत्र) के गनियारी गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। वे पारधी समुदाय से थीं। आर्थिक तंगी के बीच उनका बचपन बीता, लेकिन लोकगीतों और महाभारत की कथाओं के प्रति उनका आकर्षण बचपन से ही था। उनके नाना उन्हें महाभारत की कहानियां सुनाया करते थे। यही कहानियां आगे चलकर उनके जीवन का उद्देश्य बन गईं। कम उम्र में ही उन्होंने पंडवानी गायन सीखना शुरू कर दिया। उस समय समाज में महिलाओं द्वारा पंडवानी गाना स्वीकार्य नहीं माना जाता था। विरोध, ताने, सामाजिक बहिष्कार और अनेक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं हटाए। उन्होंने पुरुष कलाकारों द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली 'कापालिक शैली' में पंडवानी गाकर परंपराओं को चुनौती दी और इतिहास रच दिया।
तीजन बाई मंच पर केवल गीत नहीं गाती थीं, बल्कि महाभारत को जीती थीं। हाथ में तंबूरा, बुलंद आवाज़, प्रभावशाली संवाद, चेहरे के भाव और अभिनय ऐसा होता था कि दर्शक स्वयं को कुरुक्षेत्र के युद्ध के बीच महसूस करने लगते थे। उनकी प्रस्तुति में भीष्म की गंभीरता, अर्जुन का संकल्प, द्रौपदी का स्वाभिमान और श्रीकृष्ण का मार्गदर्शन सजीव हो उठता था। यही कारण था कि उनकी कला भाषा और सीमाओं की दीवारें तोड़कर दुनिया भर में सराही गई। तीजन बाई ने भारत के लगभग हर बड़े शहर में पंडवानी का प्रदर्शन किया। इसके अलावा इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका, कनाडा, जापान, रूस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस सहित अनेक देशों में अपनी प्रस्तुतियों से भारतीय लोककला का परचम लहराया। विदेशी दर्शकों ने भले ही भाषा पूरी तरह न समझी हो, लेकिन उनकी आवाज़, अभिनय और अभिव्यक्ति ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने साबित कर दिया कि लोककला की कोई सीमा नहीं होती। यदि प्रस्तुति में आत्मा हो, तो पूरी दुनिया उसे समझती और सराहती है।