Tuesday, 29 Sep 2026

ब्रह्मपुत्र पर चीन बना रहा खतरनाक ‘पानी का बम’

बीजिंग (31 अगस्त 26)। चीन तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक का निर्माण कर रहा है। यह विशाल बांध भारत की सीमा के बेहद करीब बन रहा है और इसकी क्षमता चीन के मौजूदा थ्री गॉर्जेस डैम से भी कहीं ज्यादा बताई जा रही है। लेकिन अब इस परियोजना को लेकर सबसे गंभीर सवाल भूगर्भीय सुरक्षा और भूकंप के खतरे को लेकर उठ रहे हैं। ब्रह्मपुत्र को तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो के नाम से जाना जाता है। चीन जिस स्थान पर यह परियोजना बना रहा है, वहां नदी एक विशाल मोड़ लेकर दुनिया की सबसे गहरी और लंबी घाटियों में से एक से गुजरती है और फिर भारत में प्रवेश करती है।

इस परियोजना को लेकर चिंता सिर्फ भारत या दूसरे देशों की ओर से नहीं आई है। चीन से जुड़े एक चीनी भाषा के वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित हालिया शोध में निर्माण क्षेत्र की भूगर्भीय कमजोरियों को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई है।  शोधकर्ताओं के मुताबिक, निर्माण स्थल का भूभाग ढीली संरचना और कमजोर जुड़ाव वाला है। उनका कहना है कि किसी बड़े भूकंप या फॉल्ट की हलचल से जमीन में बड़े स्तर पर अस्थिरता पैदा हो सकती है। वैज्ञानिकों ने जलाशय की ढलानों को मजबूत करने, रिटेनिंग स्ट्रक्चर लगाने और परियोजना के कुछ अहम हिस्सों में डिजाइन संबंधी बदलाव करने की सिफारिश की है।  चीन का यह विशाल बांध जिस क्षेत्र में बन रहा है, वह हिमालयी भूकंपीय पट्टी का हिस्सा है। यहां भारतीय और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेटों की लगातार टक्कर होती रहती है।  इसी वजह से यह क्षेत्र दुनिया के सबसे ज्यादा भूकंप-संवेदनशील इलाकों में शामिल है। ऐसे में इतना बड़ा जलाशय और विशाल बांध किस तरह भूकंपीय जोखिम को प्रभावित करेगा, यह बड़ा सवाल बन गया है। विशेषज्ञों की चिंता केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि भूकंप आने पर बांध को नुकसान हो सकता है। एक बड़ी आशंका यह भी है कि विशाल जलाशय का भार और पानी का दबाव आसपास की भूगर्भीय संरचनाओं पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। इसे Reservoir-Triggered Seismicity (RTS) कहा जाता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बड़े जलाशयों और भूकंपीय गतिविधियों के बीच संबंध का अध्ययन किया गया है। इस बहस में चीन का 2008 का सिचुआन भूकंप अक्सर उदाहरण के तौर पर सामने आता है। इस विनाशकारी भूकंप में करीब 90 हजार लोगों की मौत हुई थी। कुछ प्रभावशाली वैज्ञानिक अध्ययनों में यह संभावना जताई गई थी कि जिपिंगपू बांध के जलाशय में जमा पानी के भारी वजन ने किसी फॉल्ट पर दबाव बढ़ाया हो सकता है और संभवतः भूकंप के समय को आगे खिसकाया हो। हालांकि इस संबंध को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में अभी भी बहस है और इसे निर्णायक रूप से साबित तथ्य नहीं माना जाता

ब्रह्मपुत्र नदी पूर्वोत्तर भारत के लिए जीवनरेखा जैसी है। यह खेती, मत्स्य पालन, आर्द्रभूमियों और लाखों लोगों की आजीविका को सहारा देती है। इसके बाद नदी बांग्लादेश में प्रवेश करती है और वहां भी करोड़ों लोगों के जीवन और कृषि व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।  इसलिए चीन में नदी के ऊपरी हिस्से पर इतना बड़ा बांध बनने का असर सिर्फ ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं माना जा रहा। पानी के प्रवाह, बाढ़, तलछट और पारिस्थितिकी पर इसके संभावित प्रभाव भी भारत और बांग्लादेश के लिए महत्वपूर्ण हैं। इतने विशाल जलाशय के कारण एक और गंभीर सवाल यह है कि यदि किसी बड़े भूकंप, भूस्खलन या संरचनात्मक समस्या से बांध को भारी नुकसान पहुंचता है, तो नीचे की ओर अचानक पानी का विशाल प्रवाह तबाही मचा सकता है। हिमालयी नदियों की भौगोलिक प्रकृति और सीमा पार बहने वाला पानी इस जोखिम को और संवेदनशील बनाता है। हालांकि बांध टूटने से निश्चित रूप से ऐसी तबाही होगी, ऐसा कहना अभी उचित नहीं है; यह एक संभावित जोखिम है, जिसकी सुरक्षा के लिहाज से गंभीर जांच जरूरी है। हिमालयी क्षेत्र में भूकंप किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं रहते। 2025 के म्यांमार भूकंप ने भी इस पूरे क्षेत्र की भूकंपीय कनेक्टिविटी को लेकर चिंता दिखाई थी। उसके झटकों का असर करीब 1,000 किलोमीटर दूर बैंकॉक तक महसूस हुआ और वहां एक ऊंची इमारत ढह गई थी। ऐसे में ब्रह्मपुत्र के ऊपरी हिस्से में बन रही दुनिया की विशालतम जलविद्युत परियोजनाओं में से एक के लिए भूगर्भीय सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बन जाती है।

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