इंदौर (01 अक्टूबर 26)। भागीरथपुरा में दूषित पेयजल आपूर्ति की घटना किसी एक अधिकारी या स्तर की लापरवाही नहीं, बल्कि दशकों की अनदेखी और प्रशासनिक चूक का सामूहिक परिणाम है। उच्च न्यायालय के निर्देश पर गठित न्यायिक जांच आयोग की विस्तृत रिपोर्ट अधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड कर दी गई है। रिपोर्ट में वर्ष 1990 से लेकर अब तक सीवरेज और पेयजल व्यवस्था के निर्माण, रखरखाव, निगरानी तथा टेंडर प्रक्रिया में हुई अत्यधिक देरी को इस त्रासदी के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया गया है।
जांच रिपोर्ट के मुख्य बिंदु- मूलभूत खामियां (1990-2004): इंदौर विकास प्राधिकरण द्वारा वर्ष 1990 से 1995 के दौरान सीवरेज योजना की डिजाइनिंग और 1999 से 2004 के बीच पाइपलाइन बिछाने का कार्य मानकों के अनुरूप नहीं किया गया। तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों ने 'केंद्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं पर्यावरण अभियांत्रिकी संगठन' के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया। नगर निगम की विफलता: निगम के संबंधित अधिकारी समय रहते पाइपलाइन नेटवर्क में आ रही खराबी और पेयजल में दूषित पानी मिलने के खतरे को पहचानने व सुधारने में पूरी तरह नाकाम रहे। वरिष्ठ अधिकारियों की जांच: वर्ष 2013 से 2026 तक निरंतर पदस्थ रहे वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी व अधीक्षण यंत्री संजीव कुमार श्रीवास्तव सहित अन्य संबंधित अभियंताओं की भूमिका को भी जांच के दायरे में रखा गया है। निविदा प्रक्रिया में देरी: क्षतिग्रस्त पाइपलाइन नेटवर्क को बदलने के लिए जारी निविदाओं की जांच, स्वीकृति और अंतिम निर्णय में हुई प्रशासनिक लेट-लतीफी ने सुधारात्मक कार्यों को लगातार टाला, जिससे खतरा और बढ़ गया।
विभागीय जांच की सिफारिश- न्यायिक जांच आयोग ने अपने निष्कर्ष में स्पष्ट किया है कि यह निर्माण के समय हुई त्रुटियों से लेकर लंबे समय तक रख-रखाव न होने और टेंडर प्रक्रिया में हुई देरी की एक सामूहिक और समानांतर विफलता है। आयोग ने इस पूरी अवधि के दौरान पदस्थ रहे जिम्मेदार अधिकारियों और अभियंताओं के खिलाफ विस्तृत विभागीय जांच शुरू करने तथा उनकी व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने की कड़ी सिफारिश की है।
जिम्मेदारी सामूहिक, अब विस्तृत विभागीय जांच जरूरी- आयोग ने मामले में जिम्मेदारी को सामूहिक और समानांतर बताया है। रिपोर्ट के अनुसार निर्माण के समय हुई मूल खामी, बाद में लंबे समय तक रखरखाव और निगरानी में विफलता तथा क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे को बदलने में हुई प्रशासनिक देरी इन सभी ने मिलकर लापरवाही की एक लंबी श्रृंखला तैयार की। आयोग ने कहा कि अलग-अलग समय पर कार्यपालन यंत्री, अधीक्षण यंत्री और अन्य इंजीनियरिंग अधिकारी संबंधित विभागों में पदस्थ रहे और उन्हें जलापूर्ति तथा सीवरेज व्यवस्था की निगरानी एवं रखरखाव की जिम्मेदारी दी गई थी। अब यह निर्धारित करना जरूरी है कि संबंधित अधिकारियों ने अपने-अपने कार्यकाल में वैधानिक और प्रशासनिक दायित्वों का उचित तरीके से निर्वहन किया या नहीं।
घटना रातीबड़ थाना क्षेत्र के सूरजनगर की है। जहां निवासी रिटायर्ड आईएएस अधिकारी राकेश अग्रवाल की घर में धारदार हथियार से गला रेतकर हत्या कर दी गई। इस घटना की सूचना पर पहुंची पुलिस ने घटनास्थल की जांच की। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है।