इंदौर (30 अगस्त 26)। भागीरथपुरा के बहुचर्चित दूषित पानी कांड में हाईकोर्ट की ओर से गठित एक सदस्यीय न्यायिक समिति की रिपोर्ट में नगर निगम के जल विभाग से जुड़े दो अधिकारियों की जिम्मेदारी तय किए जाने की जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट में पाइपलाइन बदलने में देरी और टेंडर प्रक्रिया में लापरवाही को दूषित पानी की समस्या का प्रमुख कारण माना गया है। हालांकि रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है, इसलिए इसके निष्कर्षों पर अंतिम तस्वीर हाईकोर्ट के आदेश के बाद ही स्पष्ट होगी। दूषित पानी से लोगों की मौत मामले में हाई कोर्ट के आदेश पर यह जांच रिटायर्ड हाई कोर्ट जज सुशील कुमार गुप्ता द्वारा की गई है।
रिपोर्ट के प्रमुख बिंदुओं के अनुसार भागीरथपुरा में हुई 36 मौतों में से 24 मौतों को दूषित पानी से संबंधित माना गया है। वहीं 12 मौतों के संबंध में रिपोर्ट में स्थिति स्पष्ट नहीं होने की बात सामने आई है। जांच समिति ने मृतकों के परिजन के लिए 20 लाख रुपये तथा दूषित पानी से प्रभावित लोगों के लिए पांच लाख रुपये मुआवजे की सिफारिश किए जाने की जानकारी है। जांच में पाइपलाइन से जुड़े काम में हुई देरी को अहम वजह माना गया है। रिपोर्ट के मुताबिक यदि पाइपलाइन को समय पर बदल दिया जाता तो दूषित पानी की स्थिति बनने से रोकी जा सकती थी। पाइपलाइन बदलने के काम के साथ ही टेंडर प्रक्रिया में हुई देरी और अधिकारियों की कार्यप्रणाली की भी जांच की गई। रिपोर्ट में नगर निगम के जल विभाग से जुड़े अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर बरती गई कथित लापरवाही को घटना से जोड़ते हुए जिम्मेदारी तय किए जाने की जानकारी सामने आई है। भागीरथ पुरा केस की न्यायिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग को लेकर हाई कोर्ट मे एडवोकेट रितेश ईनानी के माध्यम से शनिवार को आवेदन लगाया गया था। वहीं, हाई कोर्ट बार अध्यक्ष मनीष यादव ने बताया कि याचिकाकतार्ओं के वकीलों को प्रिंसपल रजिस्ट्रार के समक्ष पहुंचकर रिपोर्ट के अवलोकन के लिए कहा गया था।
एमआईसी और जनप्रतिनिधियों को राहत- रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नगर निगम की मेयर-इन-काउंसिल (एमआईसी) और जनप्रतिनिधियों को घटना के लिए जिम्मेदार नहीं माना गया है। रिपोर्ट में कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी जिम्मेदारी के दायरे में नहीं रखे जाने की जानकारी है। यानी जांच समिति ने मुख्य रूप से प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर हुई चूक को घटना से जोड़ा है।
रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग- रिपोर्ट अभी आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं की गई है। इसके सामने आए प्रमुख बिंदुओं के बाद याचिकाकतार्ओं ने रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध कराने और इसे सार्वजनिक करने की मांग की है। याचिकाकर्ता प्रमोद द्विवेदी की ओर से अधिवक्ता मनीष यादव ने अदालत के समक्ष इस मुद्दे को रखा है। अधिवक्ता यादव के अनुसार मामला केवल भागीरथपुरा में हुई मौतों तक सीमित नहीं है। इसका बड़ा सवाल शहर की पेयजल व्यवस्था में जवाबदेही तय करने और भविष्य में ऐसी घटना दोबारा नहीं होने देने का है। यदि जांच रिपोर्ट में दूषित पानी को मौतों का कारण माना गया है तो पीड़ित परिवारों के मुआवजे और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई का मुद्दा भी महत्वपूर्ण होगा।