नईदिल्ली (27 अक्टूबर 25)। भारत और बांग्लादेश के बीच दशकों पुराना तीस्ता नदी विवाद अब फिर उफान पर है। इस बार विवाद में चीन की भागीदारी ने स्थिति को और पेचीदा बना दिया है। बांग्लादेश के उत्तरी इलाकों में छात्रों और नागरिकों ने ‘वॉटर जस्टिस फॉर तीस्ता’ आंदोलन के तहत सड़कों पर उतरकर चीन समर्थित ‘तीस्ता मास्टर प्लान’ के पक्ष में प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी दावा कर रहे हैं कि यह परियोजना खेती, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिए आवश्यक है। हालांकि भारत इस योजना को लेकर सतर्क है क्योंकि परियोजना का क्षेत्र सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ के बेहद करीब है। यह मार्ग भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है और इसकी चौड़ाई मात्र 20-22 किलोमीटर है। इस वजह से भारत को चिंता है कि चीन की उपस्थिति न सिर्फ बांग्लादेश में उसकी पकड़ मजबूत करेगी, बल्कि निगरानी और सैन्य दृष्टि से भी रणनीतिक खतरा पैदा कर सकती है।
तीस्ता नदी लगभग 414 किलोमीटर लंबी है। यह सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल और फिर बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन में बहती है। दोनों देशों के लिए यह नदी कृषि और जीवन का अहम स्रोत है।1983 में भारत और बांग्लादेश के बीच पानी बांटने का अस्थायी समझौता हुआ, जो लागू नहीं हो सका। 2011 में नया समझौता अंतिम चरण में पहुंचा, लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मंजूरी नहीं मिलने के कारण ठंडे बस्ते में चला गया। इसके बाद बांग्लादेश आरोप लगाता रहा कि भारत पर्याप्त पानी नहीं छोड़ता, जबकि मानसून में अधिक जल छोड़े जाने से बाढ़ की स्थिति बनती है। मार्च 2025 में बांग्लादेश के चीफ एडवाइजर मुहम्मद यूनुस बीजिंग गए और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। इस दौरान 50 साल की ‘तीस्ता मास्टर प्लान’ पर चर्चा हुई। भारत ने अभी तक इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि चीन ने इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचा बनाना शुरू किया, तो भारत की सुरक्षा और खुफिया निगरानी पर असर पड़ सकता है।