नईदिल्ली (19 मई 26)। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध, गाजा संकट, ईरान तनाव और ऊर्जा सुरक्षा के बीच भारत तेजी से अपनी नई रणनीतिक भूमिका तैयार कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई यात्रा को इसी बदलती रणनीति का बड़ा संकेत माना जा रहा है। विश्लेषकों के मुताबिक अब भारत सिर्फ तेल खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि वह पश्चिम एशिया की राजनीतिक और आर्थिक संरचना को प्रभावित करने वाली ताकत बनना चाहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि UAE भारत के लिए सिर्फ ऊर्जा सप्लायर नहीं बल्कि निवेश, लॉजिस्टिक्स, रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और समुद्री व्यापार का रणनीतिक केंद्र बन चुका है। भारत की सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा है। यहां किसी भी टकराव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, तेल कीमतों और महंगाई पर पड़ता है। इसी वजह से भारत और यूएई के बीच रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण और ऊर्जा सहयोग को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है। Israel के साथ भारत के रिश्ते रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में लगातार मजबूत हुए हैं। विश्लेषकों का कहना है कि यूएई और इजरायल के बीच बने अब्राहम समझौतों ने भारत के लिए नई संभावनाएं खोल दी हैं। इसी के तहत भारत, यूएई, इजरायल और अमेरिका का I2U2 समूह उभरा, जो खाद्य सुरक्षा, ग्रीन एनर्जी और व्यापार गलियारों पर काम कर रहा है। भारत की कोशिश है कि वह पश्चिम एशिया में ऐसा संतुलन बनाए रखे जिसमें अरब देशों के साथ भी संबंध मजबूत रहें और इजरायल के साथ भी रणनीतिक सहयोग जारी रहे। भारत की रणनीति पूरी तरह किसी एक धुरी पर आधारित नहीं है। ईरान भारत के लिए अब भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चाबहार पोर्ट और मध्य एशिया तक पहुंच में उसकी बड़ी भूमिका है। हाल ही में ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची की नई दिल्ली यात्रा को इसी संतुलन की कोशिश माना गया। हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनावों के कारण भारत-ईरान संबंधों की सीमाएं भी स्पष्ट हैं।