Tuesday, 29 Sep 2026

भोजशाला: महज नमाज पढ़ लेने से मस्जिद नहीं बनती

इंदौर (08 अप्रैल 26)। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में धार के भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर चल रहे विवाद के मुकदमे में मंगलवार को हिंदू पक्ष ने दलील दी कि 11वीं सदी के स्मारक परिसर का एक विवादित ढांचा वक्फ (धर्मार्थ अर्पित) संपत्ति कतई नहीं है और किसी स्थान पर केवल नमाज पढ़ लेने से वह जगह कानूनन मस्जिद नहीं बन जाती। भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है। उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ इस परिसर के धार्मिक स्वरूप के विवाद को लेकर दायर चार याचिकाओं और एक रिट अपील पर सोमवार (छह अप्रैल) से नियमित सुनवाई कर रही है।

सुनवाई के दूसरे दिन याचिकाकर्ताओं में शामिल संगठन 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' के वकील विष्णु शंकर जैन ने अदालत में अपनी दलीलें पेश करना जारी रखा। उन्होंने न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ के सामने कहा कि विवादित परिसर में धार के परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा 1034 में स्थापित सरस्वती मंदिर पहले से मौजूद था और इस जगह को ऐतिहासिक व राजस्व रिकॉर्ड में 'भोजशाला' के रूप में ही जाना जाता है। उन्होंने देशी-विदेशी लेखकों की किताबों, एएसआई व पुरातत्व विभाग के प्रकाशित ग्रंथों और अन्य स्त्रोतों के हवाले से दावा किया कि भोजशाला परिसर में बने मंदिर को ढहाया गया और इसके अवशेषों से खड़े किए गए विवादित ढांचे को नमाज पढ़ने के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया गया।

हिंदू पक्ष के वकील ने जोर देकर कहा कि विवादित परिसर में मूलत: कोई मस्जिद मौजूद नहीं थी और किसी जगह पर केवल नमाज पढ़ने से वह जगह कानूनन मस्जिद नहीं बन जाती। उन्होंने कहा कि इस्लामी कानून के अनुसार मस्जिद के निर्माण के लिए जमीन को स्वेच्छा से वक्फ किया जाना जरूरी है। जैन ने कहा कि भोजशाला को 1909 के पहले से संरक्षित स्मारक का दर्जा हासिल है और इसके परिसर का एक विवादित ढांचा वक्फ संपत्ति कतई नहीं है। उन्होंने हिंदू धर्मशास्त्रों की मान्यताओं का हवाला देते हुए कहा कि जैसे ही किसी मंदिर में मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा हो जाती है, वह जगह देवी-देवताओं की संपत्ति हो जाती है और एक बार मंदिर स्थापित हो जाने के बाद यह जगह हमेशा मंदिर ही रहती है। उन्होंने कहा, 'अगर कोई मंदिर ढहा दिया जाए, तब भी वह मंदिर होने के अपने मूल गुणधर्म नहीं खोता। इसलिए भोजशाला परिसर में केवल हिंदुओं को उपासना का अधिकार दिया जाना चाहिए।

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