Monday, 28 Sep 2026

मर्जी से वेश्यावृत्ति करना अब अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नईदिल्ली (03  जून 26)। भारतीय समाज में अमूमन जिस विषय पर खुलकर बात करने से कतराया जाता है उसे लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने एक युगांतरकारी और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत का यह आदेश सीधे तौर पर इंसानी गरिमा, व्यक्तिगत आजादी और मौलिक अधिकारों से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने करीब 70 साल पुराने 'इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट' (ITPA) का बारीकी से अध्ययन करने के बाद साफ कर दिया है कि अगर कोई बालिग अपनी मर्जी से सेक्स वर्क यानी वेश्यावृत्ति का रास्ता चुनता है तो उसे अपराधी नहीं माना जाएगा। जजों ने सख्त निर्देश दिए हैं कि ऐसे लोगों को सिर्फ उनके पेशे की वजह से न तो पुलिस परेशान करे और न ही उन पर कोई बेवजह कानूनी कार्रवाई की जाए।

अदालत ने अपने फैसले में इस बात को पूरी तरह स्पष्ट किया है कि आईटीपीए कानून की मूल भावना क्या है: शोषण के खिलाफ सुरक्षा: इस कानून का असली मकसद अपनी मर्जी से इस पेशे में शामिल वयस्कों को दंडित करना या प्रताड़ित करना नहीं है। मानव तस्करी पर वार: कानून का मुख्य उद्देश्य मानव तस्करी, जबरदस्ती, जालसाजी या किसी मजबूरी का फायदा उठाकर लोगों का किए जाने वाले व्यावसायिक शोषण को रोकना है। अगर किसी को धोखे से इस दलदल में धकेला जाता है तो वह कानूनन बेहद गंभीर अपराध बना रहेगा और दोषियों को सख्त सजा मिलेगी। अदालत ने आपसी सहमति से किए जाने वाले सेक्स वर्क और कानूनन प्रतिबंधित गतिविधियों के बीच का अंतर बिल्कुल साफ कर दिया है। बालिगों द्वारा आपसी रजामंदी से किया जाने वाला सेक्स वर्क अब कानूनी तौर पर अपराध के दायरे से बाहर है।

वेश्यालय चलाना जुर्म- अपनी मर्जी से काम करने की छूट का मतलब यह कतई नहीं है कि कोठा या वेश्यालय चलाने की अनुमति मिल गई है। व्यावसायिक सेक्स एक्टिविटी के लिए अपनी संपत्ति या जगह का इस्तेमाल करने देना अभी भी एक दंडनीय अपराध है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि कानून की निम्नलिखित धाराओं के उल्लंघन पर पहले की तरह ही कड़ी कार्रवाई की जाएगी: धारा 3: वेश्यालय चलाने या उसके लिए किराए पर जगह देने पर जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान है। धारा 4: किसी अन्य सेक्स वर्कर की कमाई के सहारे अपनी जिंदगी बसर करना या उसका फायदा उठाना अपराध है। धारा 5: किसी को इस धंधे में आने के लिए मजबूर करना, बहलाना-फुसलाना या उसकी तस्करी करना पूरी तरह प्रतिबंधित है। धारा 7: सार्वजनिक स्थानों, स्कूलों, अस्पतालों या धार्मिक स्थलों के आसपास इस तरह की गतिविधियों को अंजाम देना पूरी तरह गैर-कानूनी है।

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21 - Right to Life and Personal Liberty) का हवाला देते हुए कहा कि देश के हर नागरिक की तरह सेक्स वर्कर्स को भी समाज में सम्मान से जीने और पूर्ण कानूनी सुरक्षा पाने का पूरा अधिकार है। शीर्ष अदालत ने पुलिस और देश की सभी प्रशासनिक एजेंसियों को नसीहत दी है कि वे ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं तथा अपनी मर्जी से यह काम करने वाले वयस्कों के अधिकारों का हनन न करें।

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