नईदिल्ली (17 मार्च 26)। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने भारत की विदेश नीति को कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया है। ईरान, यूएस और इसराइल के बीच बढ़ते टकराव के बीच भारत को संतुलन साधना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत एक तरफ अमेरिका और इजरायल के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर ईरान भारत की ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए बेहद अहम साझेदार रहा है। यही वजह है कि मौजूदा युद्ध भारत के लिए कूटनीतिक 'अग्निपरीक्षा' बन गया है।
होर्मुज संकट से ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा- मध्य-पूर्व के तनाव का सबसे बड़ा असर Strait of Hormuz पर दिखाई दे रहा है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है भारत खाड़ी देशों से आने वाले तेल और गैस पर काफी निर्भर है। कई तेल और गैस टैंकर क्षेत्र में तनाव के कारण प्रभावित हुए हैं। यदि इस मार्ग में बाधा आती है तो भारत में ऊर्जा कीमतों और आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है। भारत पहले लंबे समय तक ईरान से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदता रहा था। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक दबाव के कारण भारत को ईरानी तेल आयात बंद करना पड़ा। इसके बाद भारत को महंगे वैश्विक बाजार से तेल खरीदना पड़ा। ऊर्जा आयात बिल में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ा। मौजूदा युद्ध ने सस्ते तेल की संभावनाओं को और भी अनिश्चित बना दिया है। भारत के लिए ईरान का चाबहार पोर्ट बेहद रणनीतिक महत्व रखता है। यह परियोजना भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापार मार्ग देने के अलावा पाकिस्तान को बायपास करने का विकल्प प्रदान करती है लेकिन ईरान के साथ बढ़ते तनाव और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इस परियोजना का भविष्य भी अनिश्चितता में घिर सकता है।