प्रयागराज (04 जुलाई 26)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह, हलाला और 3 तलाक जैसी कुप्रथाओं पर बेहद तल्ख टिप्पणी की है। अदालत ने साफ लफ्जों में कहा है कि व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) की आड़ लेकर महिलाओं के यौन शोषण की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने इन प्रथाओं को समाज का काला पन्ना करार देते हुए कहा कि ये पूरी तरह से संवैधानिक मूल्यों, लैंगिक समानता और मानवीय गरिमा के खिलाफ हैं। न्यायालय के मुताबिक, ऐसे कृत्य न केवल कानूनी तौर पर संगीन अपराध हैं, बल्कि समाज की सामूहिक अंतरात्मा को भी झकझोर कर रख देते हैं।
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पीड़िता के पूर्व पति, चाचा और मौलाना समेत अन्य आरोपियों की याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया। इन आरोपियों ने अपने खिलाफ दर्ज मुकदमे को रद्द करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि क्रिमिनल लॉ के सामने पर्सनल लॉ की दलीलें नहीं दी जा सकतीं, जब तक कि कानून खुद इसकी छूट न दे। पहली नजर में यह मामला एक नाबालिग बच्ची के साथ सुनियोजित तरीके से किए गए सामूहिक दुष्कर्म का नजर आता है, जिसकी गहराई से जांच होना बेहद जरूरी है। रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कर जांच को शुरुआती चरण में ही ठप नहीं किया जा सकता। यह झकझोर देने वाला मामला उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के सैदनागली थाना क्षेत्र का है। पीड़िता ने अपनी शिकायत में कम उम्र में जबरन निकाह, तीन तलाक और फिर हलाला के नाम पर सिलसिलेवार तरीके से हुए यौन शोषण की दर्दनाक कहानी बयां की है।