नईदिल्ली (14 सितंबर 24)। सीबीआई को ‘पिंजड़े में बंद तोता' बताने संबंधी उच्चतम न्यायालय की 2013 की टिप्पणी शुक्रवार को एक बार फिर एजेंसी के लिए उस वक्त परेशानी का सबब बन गई, जब शीर्ष अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी के लिए यह ‘आवश्यक' है कि उसे ‘पिंजरे में बंद तोता' की धारणा से बाहर निकलना चाहिए। अदालत आरएम लोढ़ा (अब रिटायर) की अध्यक्षता वाली शीर्ष अदालत की पीठ ने मई 2013 में कोयला घोटाला मामले की सुनवाई करते हुए सीबीआई को ‘मालिक की आवाज में बोलने वाला पिंजरे में बंद तोता' करार दिया था। अदालत ने आबकारी नीति 'घोटाले' के संबंध में सीबीआई द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार के एक मामले में शुक्रवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जमानत दे दी।
जस्टिस भुइयां ने एक अलग फैसला लिखते हुए कहा कि कानून के शासन द्वारा संचालित एक क्रियाशील लोकतंत्र में धारणा मायने रखती है और एक जांच एजेंसी को सभी प्रकार के संदेह से परे होना चाहिए। उन्होंने केजरीवाल को जमानत देते हुए अपने 31 पृष्ठ के फैसले में कहा, 'कुछ वर्ष पहले ही इस अदालत ने सीबीआई की आलोचना करते हुए उसकी तुलना पिंजरे में बंद तोते से की थी। यह जरूरी है कि सीबीआई ‘पिंजरे में बंद तोते की धारणा' से बाहर निकले। धारणा यह होनी चाहिए कि सीबीआई ‘पिंजरा में बंद तोता' नहीं, बल्कि स्वतंत्र जांच एजेंसी है।' जस्टिस भुइयां ने कहा कि सीबीआई देश की एक प्रमुख जांच एजेंसी है और यह लोगों के हित में है कि वह न केवल पारदर्शी हो, बल्कि ऐसा (पारदर्शी) प्रतीत भी हो।