Monday, 28 Sep 2026

BRICS: भारत रखेगा लोकल करेंसी पेमेंट का प्रस्ताव

नईदिल्ली (19 अगस्त 26)। ब्रिक्स के आगामी शिखर सम्मेलन में भारत का एक प्रस्ताव सबसे अहम मुद्दों में शामिल हो सकता है। दक्षिण अफ्रीका की समाचार वेबसाइट IOL में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक, भारत ने BRICS सदस्य देशों के घरेलू भुगतान नेटवर्क को आपस में जोड़ने के लिए एक डिजिटल ब्रिज बनाने का प्रस्ताव रखा है। इसका मकसद सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में सीधे और तेज भुगतान की व्यवस्था तैयार करना है। लेख में कहा गया है कि BRICS देश ऊर्जा कारोबार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में डॉलर पर काफी निर्भर हैं। मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने पर तेल की कीमतें बढ़ती हैं, पूंजी का प्रवाह प्रभावित होता है और स्थानीय मुद्राओं पर दबाव आता है। इसका असर BRICS के लगभग हर देश की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है।

रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण SWIFT जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था से अलग-थलग पड़ा है। चीन के लिए महंगा तेल विनिर्माण लागत बढ़ाता है और उसके निर्यात पर असर डाल सकता है। वहीं ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और इथियोपिया जैसी अर्थव्यवस्थाओं को डॉलर की कमी और मुद्रा में उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लेख में भारत की मुद्रा पर पड़ने वाले दबाव का भी जिक्र किया गया है। डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट से भारत की डॉलर में मापी जाने वाली GDP का आकार यांत्रिक रूप से कम हो सकता है। ऐसे में वैश्विक आर्थिक रैंकिंग पर भी असर पड़ सकता है। इसी पृष्ठभूमि में भारत का भुगतान-प्रणाली को जोड़ने का प्रस्ताव महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना है, जिसमें BRICS देश एक-दूसरे के साथ कारोबार करते समय हर बार डॉलर को मध्यस्थ मुद्रा के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए मजबूर न हों।

यह प्रस्ताव कॉमन BRICS करेंसी बनाने से अलग है। यानी इसका मतलब यह नहीं है कि सभी सदस्य देश अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं को खत्म करके एक नई साझा मुद्रा अपनाएंगे। प्रस्ताव का फोकस ऐसी वित्तीय तकनीक तैयार करने पर है, जो अलग-अलग देशों की मौजूदा डिजिटल या घरेलू मुद्राओं को आपस में जोड़ सके। इससे स्थानीय मुद्राओं में सीधे भुगतान संभव हो सकता है। प्रस्तावित व्यवस्था में मल्टी-CBDC ब्रिज या आपस में जुड़े फास्ट-पेमेंट नेटवर्क का इस्तेमाल किया जा सकता है। ब्लॉकचेन जैसी तकनीक की मदद से भुगतान को लगभग तुरंत और सुरक्षित तरीके से निपटाने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। इसका फायदा यह होगा कि दो देशों के कारोबारी सीधे अपनी-अपनी स्थानीय मुद्रा में भुगतान कर सकेंगे। किसी तीसरे देश की बैंकिंग व्यवस्था को बीच में लाने की जरूरत कम हो सकती है।

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