Monday, 05 Oct 2026

आरएसएस किसी के खिलाफ नहीं, सत्ता की इच्छा नहीं: भागवत

मुंबई (08 फरवरी 26)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भगवत ने शनिवार को कहा कि आरएसएस किसी के 'खिलाफ' नहीं है और न ही वह सत्ता चाहता है या 'दबाव समूह' बनने का लक्ष्य रखता है, बल्कि उसका उद्देश्य समाज को एकजुट करना है। आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने समाज में एकता की कमी सहित कई कमियों की पहचान की और अंततः इसी कारण उन्होंने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। वर्ली क्षेत्र के नेहरू सेंटर में आयोजित दो दिवसीय व्याख्यान शृंखला 'संघ की 100 साल की यात्रा: नये क्षितिज' के पहले दिन भागवत ने कहा कि आरएसएस ने बहुत पहले ही तय कर लिया था कि वह समाज के एकीकरण के अलावा कोई और काम नहीं करेगा तथा एक बार यह काम पूरा हो जाने के बाद वह कोई अन्य एजेंडा नहीं अपनाएगा।

संघ प्रमुख ने कहा कि कई लोगों को लगता ​​है कि नरेन्द्र मोदी आरएसएस की वजह से प्रधानमंत्री हैं, लेकिन मोदी भले ही एक राजनीतिक दल का नेतृत्व करते हैं और आरएसएस के कई स्वयंसेवक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं, 'राजनीतिक दल एक अलग इकाई है और वह आरएसएस का हिस्सा नहीं है।' अपने व्याख्यान में भगवत ने आजादी के आंदोलन के दौरान उभरी विभिन्न विचारधाराओं का जिक्र किया, जिनका प्रतिनिधित्व राजा राम मोहन रॉय, स्वामी विवेकानंद और दयानंद सरस्वती सहित विभिन्न सुधारकों एवं नेताओं ने किया। उन्होंने कहा, 'हालांकि, फिर भी कुछ हद तक यह देखा जाता है कि समाज को दिशा देने और अनुकूल वातावरण बनाने का काम नहीं हो रहा है।" भागवत ने कहा कि आरएसएस "किसी के खिलाफ' नहीं है और न ही किसी घटना की प्रतिक्रिया के रूप में काम करता है। उन्होंने कहा कि संघ का मुख्य उद्देश्य देश में जारी सकारात्मक प्रयासों का समर्थन करना और उन्हें मजबूत करना है।

भागवत ने कहा कि संघ कोई अर्धसैनिक बल नहीं है, भले ही वह नियमित 'पथ संचलन' करता है और उसके स्वयंसेवक लाठी रखते हैं, लेकिन इसे 'अखाड़ा' के रूप में भी नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आरएसएस राजनीति में भी शामिल नहीं है, हालांकि इससे जुड़े कुछ लोग राजनीतिक जीवन में सक्रिय हैं। हेडगेवार को संघ की स्थापना के लिए प्रेरित करने वाले कारकों के बारे में बात करते हुए भगवत ने कहा कि अपने शुरुआती दिनों में हेडगेवार ने असहयोग आंदोलन का समर्थन किया और उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया, यहां तक ​​कि उन्हें एक साल की जेल की सजा भी सुनाई गई। संघ प्रमुख ने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए हेडगेवार ने समाज को एकजुट करने के तरीकों पर प्रयोग करना शुरू किया। उन्होंने कहा कि इसी क्रम में 1925 में विजयदशमी के दिन आरएसएस की स्थापना की गई, जिसका लक्ष्य संपूर्ण हिंदू समुदाय को एकजुट करना था। भागवत ने कहा कि बाइबिल की एक पंक्ति आरएसएस पर भी लागू होती है कि 'यह नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि पूर्ण करने के लिए आया है।' संघ प्रमुख ने कहा कि आरएसएस अपने स्वयंसेवकों की गतिविधियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई नियंत्रण नहीं रखता है। उन्होंने कहा कि लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि चूंकि आरएसएस के स्वयंसेवक कई क्षेत्रों में सक्रिय हैं, इसलिए वे कार्य आरएसएस के हैं, लेकिन यह गलत धारणा है।

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