नईदिल्ली (08 जून 25)। भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव ने उपमहाद्वीप की स्थिरता को गंभीर खतरे में डाल दिया है। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी हमलों और उसके नेताओं के भड़काऊ बयानों ने एक बार फिर भारत को कड़ी प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर कर दिया है। 1972 का शिमला समझौता और 1960 की सिंधु जल संधि, जो दोनों देशों के संबंधों की नींव माने जाते थे, अब सवालों के घेरे में हैं।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में एक टेलीविज़न इंटरव्यू में दावा किया कि शिमला समझौता अब 'मृत दस्तावेज़' है और नियंत्रण रेखा सिर्फ एक 'सीज़फायर लाइन' भर रह गई है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अब पाकिस्तान कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाएगा न कि भारत के साथ द्विपक्षीय वार्ता में। भारत ने इस बयान को पूरी तरह खारिज करते हुए पाकिस्तान को चेतावनी दी कि यदि वह 1972 के समझौते की मूल भावना से पीछे हटेगा, तो परिणाम भुगतने को तैयार रहे। इस पर पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने आनन-फानन में सफाई दी कि शिमला समझौता अब भी प्रभावी है लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह दोहरे रवैये की रणनीति है। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले (26 पर्यटकों की मौत) के बाद भारत ने पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश देते हुए सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया। भारत का कहना है कि 'पानी और आतंक एक साथ नहीं बह सकते।' पाकिस्तान ने इसे 'जल युद्ध' कहा और चार कड़े विरोध-पत्र भेजे। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन से आतंकवाद को खत्म नहीं करता कोई संधि बहाल नहीं होगी। भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में CII कार्यक्रम में कहा था कि 'वो दिन दूर नहीं जब POK हमारे पास होगा। वहां के लोग खुद भारत में शामिल होना चाहते हैं।'