नईदिल्ली (09 मार्च 26)। अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करने और लोगों को जल्दी न्याय दिलाने के उद्देश्य से बनाए गए विभिन्न न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) अब खुद ही मामलों के भारी दबाव से जूझ रहे हैं। हालात यह हैं कि इन संस्थानों में लाखों मामले लंबित पड़े हैं और बड़ी संख्या में पद खाली होने के कारण मामलों का निपटारा धीमा हो गया है। कानून मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश के अलग-अलग न्यायाधिकरणों में कुल मिलाकर 5 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं। इन मामलों की बढ़ती संख्या की सबसे बड़ी वजह अध्यक्षों, न्यायिक सदस्यों, तकनीकी सदस्यों और कर्मचारियों की कमी बताई जा रही है।
मंत्रालय द्वारा दिसंबर 2025 तक जारी आंकड़ों के अनुसार कई न्यायाधिकरणों में लगभग 18 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। स्थिति यह है कि सात न्यायाधिकरण ऐसे हैं जहां फिलहाल अध्यक्ष का पद ही खाली है। इसके अलावा विभिन्न न्यायाधिकरणों में 20 पीठासीन अधिकारियों के पद रिक्त हैं। 110 न्यायिक सदस्यों के पद खाली हैं। 111 तकनीकी सदस्यों के पद भी भरे नहीं गए हैं। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) में अकेले 37 सदस्यों के पद खाली हैं। वहीं सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) में भी 15 पद रिक्त बताए गए हैं। कई अन्य न्यायाधिकरणों में भी न्यायिक और तकनीकी पद लंबे समय से खाली पड़े हैं, जिससे मामलों के निपटारे की गति प्रभावित हो रही है। न्यायाधिकरणों की व्यवस्था वर्ष 1976 में संविधान में किए गए 42वें संशोधन के जरिए लागू की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य पारंपरिक अदालतों, खासकर उच्च न्यायालयों पर बढ़ते मुकदमों के बोझ को कम करना था। इन न्यायाधिकरणों की खास बात यह है कि इनमें न्यायिक सदस्यों के साथ-साथ संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाता है। इससे उम्मीद की गई थी कि विशेष मामलों में विशेषज्ञता के आधार पर तेजी से फैसले हो सकेंगे और लोगों को जल्दी न्याय मिल सकेगा।