Thursday, 01 Oct 2026

ब्रिक्स: एक जिला-एक उत्पाद का मॉडल छाया

इंदौर (11 जून 26)। ब्रिक्स कृषि सम्मेलन में शामिल विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों और विदेशी मेहमानों ने मंगलवार को इंदौर के प्रसिद्ध ग्रामीण हाट का भ्रमण कर मध्यप्रदेश की कृषि विविधता, ग्रामीण उद्यमिता और पारंपरिक ज्ञान की समृद्ध विरासत को करीब से देखा। मालवी परंपरा के अनुरूप पगड़ी पहनाकर उनका स्वागत किया गया, जबकि जनजातीय कलाकारों के लोकनृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मेहमानों का मन मोह लिया। ग्रामीण हाट में एक जिला-एक उत्पाद (ओडीओपी) के तहत प्रदर्शित कृषि उत्पाद विदेशी प्रतिनिधियों के आकर्षण का केंद्र रहे। बुरहानपुर के केले से तैयार चिप्स, कुकीज और केले के रेशों से बने वस्त्रों को देखकर मेहमानों ने कृषि आधारित मूल्य संवर्धन की सराहना की। उन्होंने स्थानीय उत्पादकों से संवाद कर उत्पादन और प्रसंस्करण की जानकारी भी प्राप्त की।

रीवा के जीआई टैग प्राप्त सुंदरजा आम सहित विभिन्न प्रजातियों के आमों का स्वाद लेकर विदेशी प्रतिनिधि अभिभूत नजर आए। वहीं बालाघाट के जीआई टैग प्राप्त चिन्नौर चावल की विशेषताओं ने भी उनका ध्यान आकर्षित किया। आमों की सुगंध और स्वाद की उन्होंने खुलकर प्रशंसा की। मंडला जिले की 'मिलेट क्वीन' लहरी बाई द्वारा संरक्षित दुर्लभ श्रीअन्न बीजों के संग्रह ने ब्रिक्स देशों के प्रतिनिधियों को विशेष रूप से प्रभावित किया। झाबुआ की पारंपरिक फसलें, नीमच की औषधीय फसलें, नरसिंहपुर का पारंपरिक गुड़ और प्राकृतिक खेती आधारित उत्पादों में भी उन्होंने गहरी रुचि दिखाई। मृगनयनी के चंदेरी, महेश्वरी और कोसा वस्त्र, बाघ प्रिंट तथा गोंड चित्रकला की विदेशी मेहमानों ने प्रशंसा की। प्रकृत सिल्क के तसर और मलबरी सिल्क परिधानों तथा हेम्प क्लोदिंग के पर्यावरण-अनुकूल वस्त्रों ने भी उनका ध्यान आकर्षित किया। कई प्रतिनिधियों ने स्मृति स्वरूप खरीदारी भी की। ग्रामीण हाट में पारंपरिक खाटों पर बैठकर प्रतिनिधियों ने स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लिया। शुद्ध शहद, ए-2 दुग्ध उत्पाद, हर्बल उत्पाद और गोबर आधारित पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों की जानकारी भी उन्हें दी गई।

ब्रिक्स कृषि सम्मेलन के तहत इंदौर पहुंचे विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने बुधवार को ऐतिहासिक राजवाड़ा का भ्रमण कर होलकरकालीन कृषि व्यवस्था, प्रशासनिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत की जानकारी प्राप्त की। इथियोपिया, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया सहित अन्य देशों से आए मेहमानों का मालवी परंपरा के अनुसार स्वागत किया गया। राजवाड़ा के गणेश हॉल, दरबार हॉल और अन्य कक्षों का अवलोकन करते हुए प्रतिनिधि इसकी भव्य स्थापत्य कला और नक्काशी से प्रभावित नजर आए। इतिहासकारों ने उन्हें बताया कि होलकर शासनकाल में कम्पोस्ट पद्धति से जैविक खेती की जाती थी, जिसमें कृषि अवशेष, गोबर, राख और जैविक कचरे से खाद तैयार की जाती थी। इस पद्धति का उल्लेख कृषि वैज्ञानिक सर अल्बर्ट हावर्ड ने भी अपने अध्ययन में किया है।








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