नईदिल्ली (17 दिसंबर 24)। भारत में महिलाओं, बच्चों और ट्रांसजेंडरों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (16 दिसंबर 2024) को एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया। इस याचिका में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बढ़ती हिंसा को रोकने के लिए कुछ कड़े कदम उठाने का प्रस्ताव किया गया था। इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने बलात्कारियों को नपुंसक बनाने जैसी सजा की मांग की थी, साथ ही सार्वजनिक परिवहन में उचित सामाजिक व्यवहार बनाए रखने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की भी बात कही थी। अदालत ने इस मामले में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार किया, लेकिन बलात्कारियों को नपुंसक बनाने की सजा को 'अमानवीय' और 'बर्बर' बताते हुए उसे खारिज कर दिया।
याचिकाकर्ताओं ने महिलाओं, बच्चों और ट्रांसजेंडरों के खिलाफ बढ़ती हिंसा को रोकने के लिए विभिन्न सुझाव दिए थे। इनमें से कुछ मुख्य बिंदु थे- याचिका में ऑनलाइन पोर्नोग्राफी पर रोक लगाने की मांग की गई थी, ताकि इसका दुरुपयोग कर अपराधियों द्वारा महिलाओं का शोषण किया जा सके। याचिकाकर्ताओं ने स्कैंडिनेवियाई देशों की तरह बलात्कारियों को नपुंसक बनाने की सजा देने की बात की थी, ताकि यौन हिंसा के अपराधियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जा सकें। याचिका में यह भी कहा गया था कि सार्वजनिक परिवहन जैसे बसों, मेट्रो और ट्रेनों में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों को रोकने के लिए नियम और दिशानिर्देश तैयार किए जाएं। साथ ही, इन स्थानों पर उचित सामाजिक व्यवहार को सुनिश्चित करने के लिए सख्त कानून लागू किए जाएं। याचिकाकर्ता ने समाज में महिलाओं और बच्चों के लिए एक सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस याचिका पर विचार करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। बेंच के सदस्य जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों पर अपनी टिप्पणी दी। अदालत ने बलात्कारियों को नपुंसक करने जैसी सजा को 'अमानवीय' और 'बर्बर' करार दिया। कोर्ट ने कहा, "यद्यपि हम इस बात से सहमत हैं कि महिलाओं के लिए सुरक्षा को लेकर उठाए गए कदम महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह सजा सख्त और नकारात्मक असर डाल सकती है।"