नईदिल्ली (14 फरवरी 26)। नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल न्यायिक शिक्षकों की 11वीं द्विवार्षिक बैठक के उद्घाटन सत्र में भारत के मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant ने न्यायपालिका की कार्यशैली और नेतृत्व को लेकर गंभीर और विचारोत्तेजक बातें रखीं। उन्होंने कहा कि न्यायिक व्यवस्था की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि उसके भीतर सीखने और सुधार की गुंजाइश बनी रहे। यदि न्यायाधीश खुद को पूर्ण या त्रुटिहीन मानने लगें, तो वही सोच संस्थागत कमजोरी की वजह बन सकती है।
CJI ने अपने संबोधन में कहा कि अक्सर नियुक्ति के समय न्यायाधीशों को एक 'पूर्ण उत्पाद' की तरह देखा जाता है। शुरुआत में यह सम्मानजनक प्रतीत हो सकता है, लेकिन लंबे समय में यह दृष्टिकोण न्यायिक प्रणाली के विकास में बाधा डालता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायिक नेतृत्व न्यायाधीशों की अपूर्णता से प्रभावित नहीं होता, बल्कि तब कमजोर पड़ता है जब हम यह मान लेते हैं कि उनमें कोई कमी नहीं है। CJI ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायाधीशों और न्यायिक संस्थानों को निरंतर आत्ममूल्यांकन और सुधार के लिए तैयार रहना चाहिए। उनके अनुसार, इतिहास में जिन न्यायिक नेताओं को सबसे अधिक सम्मान मिला, वे अपनी सीमाओं को पहचानते थे और सीखने के लिए खुले रहते थे। उन्होंने यह भी कहा कि विनम्रता केवल व्यक्तिगत गुण नहीं है, बल्कि यह एक पेशेवर सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। इसे न्यायिक प्रशिक्षण का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
'Educating for Judicial Leadership'थीम पर आयोजित इस बैठक में विभिन्न देशों के न्यायिक शिक्षकों और विशेषज्ञों ने भाग लिया। CJI के मुताबिक, ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच न्यायिक प्रणालियों को आत्म-चिंतन का अवसर देते हैं। भले ही बदलाव तुरंत दिखाई न दें, लेकिन सोच में आया परिवर्तन समय के साथ संस्थाओं को अधिक सशक्त बनाता है।