नईदिल्ली (11 जुलाई 24)। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टिन गॉर्ज मसीह ने फैसला सुनाया और कहा कि मुस्लिम महिला भरण-पोषण के लिए कानूनी अधिकार का इस्तेमाल कर सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 125 सभी विवाहित महिलाओं पर लागू होती है, फिर चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। कोर्ट ने एक बार फिर कहा है कि मुस्लिम महिला अपने पति के खिलाफ धारा 125 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण के लिए याचिका दायर कर सकती है।
पीठ ने कहा कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 धर्मनिरपेक्ष कानून पर हावी नहीं होगा।न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, 'हम आपराधिक अपील को इस निष्कर्ष के साथ खारिज कर रहे हैं कि सीआरपीसी की धारा 125 सभी महिलाओं पर लागू होगी, न कि सिर्फ विवाहित महिलाओं पर।' शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि गुजारा भत्ता मांगने का कानून सभी महिलाओं के लिए मान्य होगा, न कि सिर्फ विवाहित महिलाओं के लिए। 1985 में शाह बानो मामले में एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 एक धर्मनिरपेक्ष प्रावधान है जो मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है। हालाँकि, इसे मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 द्वारा रद्द कर दिया गया था और कानून की वैधता को 2001 में बरकरार रखा गया था।