नईदिल्ली (05 फरवरी 26)। वैश्विक सुरक्षा एक बार फिर अनिश्चितता के दौर में प्रवेश करती दिख रही है। अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों को सीमित करने वाली अंतिम प्रभावी संधि न्यू स्टार्ट अब समाप्त हो चुकी है। यदि अंतिम क्षणों में कोई नया समझौता नहीं होता, तो यह बीते पांच दशकों में पहली बार होगा जब दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियां बिना किसी कानूनी बंधन के अपने परमाणु हथियारों को बढ़ाने के लिए स्वतंत्र होंगी। 2010 में चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में हस्ताक्षरित न्यू स्टार्ट संधि के तहत दोनों देशों ने तैनात परमाणु वॉरहेड्स और डिलीवरी सिस्टम्स की संख्या पर सीमा तय की थी। हथियार नियंत्रण विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता वैश्विक समय के मुताबिक बुधवार देर रात आधिकारिक रूप से समाप्त हो गया।
1962 के क्यूबा मिसाइल संकट के बाद दुनिया ने परमाणु टकराव के खतरे को कम करने के लिए कई अहम समझौते किए थे। उस दौर को इतिहासकार मानव सभ्यता के सबसे खतरनाक क्षणों में गिनते हैं। न्यू स्टार्ट उन्हीं प्रयासों की आखिरी कड़ी थी, जिसने दशकों से परमाणु संतुलन को किसी हद तक संभालकर रखा हुआ था। हालात की गंभीरता को देखते हुए पोप लियो ने भी अमेरिका और रूस से इस संधि को बचाने की अपील की। अपने साप्ताहिक संदेश में उन्होंने कहा कि डर, अविश्वास और टकराव की राजनीति से हटकर मानवता के साझा भविष्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस मुद्दे पर विरोधाभासी बयान देते रहे हैं। बीते महीने उन्होंने कहा था कि न्यू स्टार्ट के बाद एक “बेहतर समझौता” किया जा सकता है। वहीं, रूस की ओर से संकेत दिए गए हैं कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रस्तावों पर अमेरिका की तरफ से अब तक कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संधि का खत्म होना सिर्फ परमाणु हथियारों की संख्या पर नियंत्रण हटने तक सीमित नहीं है। इसके साथ निरीक्षण, पारदर्शिता और आपसी भरोसे की वह पूरी व्यवस्था भी कमजोर हो जाएगी, जिसके जरिए यह निगरानी की जाती थी कि कौन सा देश क्या और कितना बना रहा है।हालांकि, हथियार नियंत्रण समझौतों के विरोधी इसे अलग नजरिए से देखते हैं। उनके अनुसार, ऐसी संधियां महाशक्तियों की रणनीतिक स्वतंत्रता को सीमित करती हैं और नई सैन्य तकनीकों के विकास में बाधा बनती हैं।