नईदिल्ली (04 दिसंबर 25)। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा को लेकर अमेरिका ही नहीं, यूरोप के कई बड़े देश भी खुलकर नाराजगी जता रहे हैं। इसी बीच रूस संग ब्रह्मोस मिसाइल के एडवांस वर्जन पर भी समझौता संभव हो सकता है। इसके बाद नाराजगी और बढ़ सकती है। जिसे लेकर ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के राजनयिकों ने संयुक्त लेख लिखकर भारत की विदेश नीति पर अप्रत्यक्ष सवाल खड़े किए, जिसे भारत ने अपनी संप्रभुता और कूटनीतिक मर्यादा पर हमला माना। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर पश्चिमी देश अपनी रवैये से बाज नहीं आए, तो नुकसान उनका ही होगा।
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यह पुतिन की सबसे दुर्लभ विदेश यात्राओं में से एक है। पिछले तीन वर्षों से अमेरिका और यूरोप पुतिन को वैश्विक मंच से अलग-थलग करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत जब पुतिन का ‘रेड कार्पेट’ वेलकम करता है, तो पश्चिमी देशों की यह मुहिम कमजोर साबित होती दिखती है। यही कारण है कि पुतिन के दिल्ली पहुंचने से पहले ही यूरोप के तीन बड़े देशों ने अपना ‘नाराजगी अभियान’ शुरू कर दिया।भारत में तैनात ब्रिटेन की उच्चायुक्त लिंडी कैमरून, फ्रांस के राजदूत थिएरी मथौ और जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन ने एक साझा लेख लिखकर पुतिन को यूक्रेन युद्ध का ‘विलेन’ बताया और कहा कि रूस शांति चाहता ही नहीं। भारत ने इस लेख पर कड़ा आपत्ति जताते हुए स्पष्ट किया कि यह कूटनीतिक मर्यादा से परे है। पश्चिमी देशों के राजदूतों द्वारा भारत की विदेश नीति पर सवाल उठाने वाले संयुक्त लेख के बाद अब भारत ने मोर्चा संभाल लिया है। इसी बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ‘इंडिया ग्लोबल फोरम’ में एक अलग ही मंच से अमेरिका और यूरोप को सीधा संदेश देते हुए स्पष्ट कर दिया कि भारत अब आरोप सुनने के मूड में नहीं है, बल्कि जवाब देने की स्थिति में है।
जयशंकर ने माइग्रेशन और टैलेंट पर बढ़ते पश्चिमी दबाव की आलोचना करते हुए कहा कि पश्चिमी देशों में बढ़ती आर्थिक दिक्कतों की जिम्मेदारी प्रवासियों पर थोपना गलत है। उन्होंने कहा कि पिछले 20 वर्षों में अमेरिका और यूरोप ने खुद अपने बिज़नेस और मैन्युफैक्चरिंग को विदेशों में शिफ्ट किया था, जिससे स्थानीय नौकरियों में कमी आई। जयशंकर ने तीखे शब्दों में कहा 'अपनी गलतियों का ठीकरा हम पर मत फोड़िए। आपकी आर्थिक समस्याओं के लिए प्रवासी जिम्मेदार नहीं हैं।'विदेश मंत्री ने चेतावनी दी कि आज दुनिया ‘नॉलेज इकोनॉमी’ के युग में है और अगर पश्चिमी देश टैलेंट के प्रवाह में बाधाएं खड़ी करेंगे, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं को होगा। उन्होंने साफ कहा कि भारत को किसी की दया की जरूरत नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों को भारत की स्किल्ड वर्कफोर्स की जरूरत है।