ढाका (18 फरवरी 26)। 17 वर्षों तक स्वनिर्वासन में रहने के बाद बांग्लादेश की राजनीति में जोरदार वापसी करते हुए तारिक रहमान ने मंगलवार को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। 60 वर्षीय रहमान पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने हैं और उन्होंने अपने पिता द्वारा स्थापित बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को 20 वर्षों के अंतराल के बाद दोबारा सत्ता में पहुंचाया है। बीएनपी की स्थापना पूर्व राष्ट्रपति और सैन्य शासक से राजनेता बने जियाउर रहमान ने की थी। 1981 में उनकी हत्या के बाद लगभग चार दशकों तक पार्टी की कमान तारिक की मां खालिदा जिया के हाथों में रही। दिसंबर 2025 में बांग्लादेश लौटने पर तारिक रहमान का भव्य स्वागत हुआ, लेकिन महज पांच दिन बाद उन्हें निजी त्रासदी का सामना करना पड़ा, जब लंबी बीमारी के बाद खालिदा जिया का निधन हो गया।
12 फरवरी को हुए 13वें संसदीय चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने 297 में से 209 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिलीं। चुनावों से पहले जब बीएनपी राजनीतिक रूप से हाशिये पर थी, तब तारिक रहमान ने पार्टी अध्यक्ष का दायित्व संभाला और संगठन के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी उठाई।वंशवादी राजनीति का आरोप झेलने के बावजूद तारिक रहमान ने संयमित भाषा, सुलह की अपील और आक्रामक बयानबाजी से दूरी बनाकर चुनाव अभियान को अलग दिशा दी। मृदुभाषी छवि के बावजूद वे बड़े जनसमूह को आकर्षित करने में सफल रहे। दिसंबर में स्वदेश लौटते ही उन्होंने कहा था- 'मेरे पास अपने देश और अपने लोगों के लिए एक स्पष्ट योजना है।' तारिक रहमान का जन्म 20 नवंबर 1965 को ढाका में हुआ। बचपन में उन्होंने 1971 का मुक्ति संग्राम देखा और अपनी मां व भाई के साथ गिरफ्तारी भी झेली। स्वतंत्रता के दिन 16 दिसंबर 1971 को उन्हें रिहा किया गया।
उन्होंने ढाका विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पढ़ाई शुरू की, लेकिन बीच में छोड़ दी और बाद में कपड़ा व कृषि व्यवसाय से जुड़े। अवामी लीग शासनकाल के दौरान उन पर भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों के आरोप लगे। 2004 में शेख हसीना की रैली पर हुए ग्रेनेड हमले में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी, जिसे उन्होंने हमेशा राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया। शेख हसीना के सत्ता से हटने और मोहम्मद यूनुस के अंतरिम शासन में उन्हें सभी मामलों में बरी कर दिया गया। 2008 में इलाज का हवाला देकर विदेश गए तारिक रहमान 17 वर्षों तक लंदन में रहे। 2018 में खालिदा जिया की गिरफ्तारी के बाद उन्हें बीएनपी का कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया। आज प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना उनके लंबे, विवादित और संघर्षपूर्ण राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।