नईदिल्ली (30 जनवरी 25)। देश की सर्वोच्च अदालत ने राज्य कोटे के भीतर पोस्ट ग्रेजुएशन मेडिकल पाठ्यक्रमों के लिए सीटों के तहत दिए जाने वाले मूल निवास आरक्षण को खत्म कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से मूल निवासी आरक्षण को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताते हुए रद्द किया है। ऐसे में अब इस आरक्षण का उपयोग छात्र एडमिशन के लिए नहीं कर पाएंगे। हालांकि कोर्ट ने इस दौरान यह साफ कर दिया जो स्टूडेंट मूल निवासी आरक्षण के तहर प्रवेश ले लिए हैं या जो ले चुके है। ऐसे अभ्यर्थियों पर किसी तरह का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ ने कहा कि भारत के नागरिक और निवासी के रूप में 'हमें कहीं भी निवास चुनने का अधिकार है, संविधान हमें पूरे भारत में शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश चुनने का अधिकार भी देता है।' पीठ ने अपने बयान में आगे कहा कि 'हम सभी भारत के निवासी हैं। हमारा केवल एक ही निवास स्थान है और वह है देश। हम सभी भारत के निवासी हैं। हमें भारत में कहीं भी निवास चुनने और उसका पालन करने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि कोई भी कहीं भी अपने प्रोफेशन/ व्यापर को आगे बढ़ा सकते है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 'किसी विशेष राज्य में रहने वालों के लिए" इस पर विचार किया जा सकता है, लेकिन यह केवल ग्रेजुएशन पाठ्यक्रमों पर ही लागू होगा। यह पोस्ट ग्रेजुएशन पाठ्यक्रमों पर लागू नहीं होगा।' अदालत ने कहा कि 'विशेषज्ञ डॉक्टरों के महत्व को देखते हुए, उच्च स्तर पर निवास के आधार पर आरक्षण अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।' कोर्ट ने कहा कि पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश केवल योग्यता के आधार पर यानी कि NEET/ राष्ट्रीय पात्रता / प्रवेश परीक्षा के स्कोर पर हो न कि राज्यों में दिए जा रहे मूल निवासी कोटे के आधार पर। दरअसल, मूल निवासी आरक्षण, राज्य सरकार के अधीन आने वाली नौकरियों में उस राज्य के अधिवासियों को मिलता है। कुछ अपवादों को छोड़कर, राज्य सरकार की नौकरियां उस राज्य के ही रहने वाले लोगों के लिए आरक्षित होती हैं। इसमें प्रदेश में दूसरे राज्य के निवासियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है।