Sunday, 04 Oct 2026

रंग, पिचकारी नहीं, बारूद से खेली जाती है होली

उदयपुर (14 मार्च 25)। होली का त्यौहार नजदीक आते ही राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी धूम देखने को मिलती है। लेकिन राजस्थान के मेनार गांव में होली का जश्न बिल्कुल अनूठा होता है, क्योंकि यहां फूलों और रंगों के बजाय बारूद से होली खेली जाती है। यह अनोखी परंपरा पूरे देशभर में अपनी अलग पहचान रखती है। मेनार गांव, उदयपुर से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित है, और इस ऐतिहासिक परंपरा को देखने के लिए हर साल हजारों लोग यहां पहुंचते हैं।

इतिहासकार चंद्रशेखर शर्मा के अनुसार, मेनार गांव की यह परंपरा 500 साल पुरानी है और इसे मुगलों के खिलाफ विजय की याद में मनाया जाता है। कहा जाता है कि जब महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी युद्ध के दौरान पूरे मेवाड़ को मुगलों के खिलाफ संगठित किया, तब अमर सिंह के नेतृत्व में मुगलों की छावनियों पर हमले किए गए। मेनार गांव के रणबांकुरों ने भी मुगलों को पराजित कर अपनी भूमि को स्वतंत्र किया। इस जीत की याद में यहां हर साल शौर्य पर्व ‘जमराबीज’ मनाया जाता है, जिसमें बंदूक और बारूद से होली खेली जाती है।

15 मार्च की रात जब शाम ढलेगी, तो मेनार गांव का मुख्य चौक ओंकारेश्वर चौक सैनिकों के जमावड़े से गूंज उठेगा। गांव के लोग पूर्व राजपूत सैनिकों की पोशाक (धोती-कुर्ता, कसुमल पाग) पहनकर, बंदूकें और तलवारें लेकर ललकारते हुए अलग-अलग रास्तों से चौक पर इकट्ठा होते हैं। फिर रंगों की जगह बारूद की गूंज से होली खेली जाती है। यह नज़ारा किसी युद्ध के मैदान से कम नहीं होता और यह परंपरा मेवाड़ की गौरवशाली विरासत की याद दिलाती है। होली से पहले ही गांव को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। घरों पर रंग-बिरंगी लाइटें लगाई जाती हैं और पूरा गांव दिवाली जैसी रोशनी में नहाया नजर आता है। देश-विदेश में बसे गांव के युवा भी इस ऐतिहासिक परंपरा में शामिल होने के लिए अपने वतन लौटते हैं।

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